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Thursday

चारों ओर से परीक्षण: एक शिक्षाप्रद कहानी (Tested from All Sides: An Educational Tale")



'यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते,

निघर्षणच्छेदनतापताडनैः तथा,

चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते,

श्रुतेन शीलेन गुणेन कर्मणा.'

चाणक्य नीति: व्यापार और वित्त के मूल मंत्र



कहानी का कोई नाम नहीं था, लेकिन यह गाँव के एक युवक के जीवन की कहानी थी, जिसका नाम राजत था। राजत गरीब परिवार से था और वह एक छोटे से गाँव में रहता था।

राजनीति का ज्ञान: चाणक्य के उपदेश



कहानी की शुरुआत होती है एक छोटे से राज्य के राजा रविकांत के साथ। रविकांत ने राज्य को संबोधित किया और उन्होंने देखा कि राज्य में अनेक समस्याएं हैं जो समाधान की आवश्यकता है।

चाणक्य के अनमोल सूत्र: सफलता की राह


कहानी एक छोटे से गाँव की है, जहाँ एक 
आदित्य नामक युवक अपने सपनों की पुर्ति के लिए मेहनत कर रहा था। गाँव में बड़ा सामंत रहता था जिसका नाम राजेंद्र था। राजेंद्र गाँव के सभी लोगों के लिए आदर्श थे, लेकिन वह अकेले आदित्य को नकारात्मक दृष्टिकोण से देखते थे।

Wednesday

चाणक्य नीति - प्रथमोऽध्यायः श्लोक 17 का अर्थ

स्त्रीणां द्विगुण आहारो लज्जा चापि चतुर्गुणा ।
साहसं षड्गुणं चैव कामश्चाष्टगुणः स्मृतः ॥ 17 ॥

चाणक्य नीति - प्रथमोऽध्यायः श्लोक 16 का अर्थ


विषादप्यमृतं ग्राह्यममेध्यादपि कांचनम् ।
अमित्रादपि सद्वृत्तं बालादपि सुभाषितम् ॥ 16 ॥

चाणक्य नीति - प्रथमोऽध्यायः श्लोक 15 का अर्थ


नदीनां शस्त्रपाणीनांनखीनां श‍ऋंगिणां तथा ।
विश्वासो नैव कर्तव्यः स्त्रीषु राजकुलेषु च ॥ 15 ॥

चाणक्य नीति - प्रथमोऽध्यायः श्लोक 14 का अर्थ

वरयेत्कुलजां प्राज्ञो विरूपामपि कन्यकाम् ।
रूपशीलां न नीचस्य विवाहः सदृशे कुले ॥ 14 ॥

चाणक्य नीति - प्रथमोऽध्यायः श्लोक 13 का अर्थ

यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवं परिषेवते ।
ध्रुवाणि तस्य नश्यंति चाध्रुवं नष्टमेव हि ॥ 13 ॥

चाणक्य नीति - प्रथमोऽध्यायः श्लोक 12 का अर्थ

आतुरे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रुसंकटे ।
राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बांधवः ॥ 12 ॥

चाणक्य नीति - प्रथमोऽध्यायः श्लोक 11 का अर्थ


जानीयात्प्रेषणे भृत्यान्बांधवान् व्यसनागमे ।
मित्रं चापत्तिकालेषु भार्यां च विभवक्षये ॥ 11 ॥

चाणक्य नीति - प्रथमोऽध्यायः श्लोक 10 का अर्थ


लोकयात्रा भयं लज्जा दाक्षिण्यं त्यागशीलता ।
पंच यत्र न विद्यंते न कुर्यात्तत्र संस्थितिम् ॥ 10 ॥

चाणक्य नीति - प्रथमोऽध्यायः श्लोक 09 का अर्थ


धनिकः श्रोत्रियो राजा नदी वैद्यस्तु पंचमः ।
पंच यत्र न विद्यंते न तत्र दिवसं वसेत् ॥ 09 ॥

चाणक्य नीति - प्रथमोऽध्यायः श्लोक 08 का अर्थ


यस्मिंदेशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बांधवाः ।
न च विद्यागमोऽप्यस्ति वासं तत्र न कारयेत् ॥ 08 ॥

चाणक्य नीति - प्रथमोऽध्यायः श्लोक 07 का अर्थ


आपदर्थे धनं रक्षेच्छ्रीमतां कुत आपदः ।
कदाचिच्चलते लक्ष्मीः संचितोऽपि विनश्यति ॥ 07 ॥

चाणक्य नीति - प्रथमोऽध्यायः श्लोक 05 का अर्थ

दुष्टा भार्या शठं मित्रं भृत्यश्चोत्तरदायकः ।
ससर्पे च गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः ॥ 05 ॥

चाणक्य नीति - प्रथमोऽध्यायः श्लोक 04 का अर्थ

मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टस्त्रीभरणेन च ।
दुःखितैः संप्रयोगेण पंडितोऽप्यवसीदति ॥ 04 ॥

चाणक्य नीति - प्रथमोऽध्यायः श्लोक 03 का अर्थ

तदहं संप्रवक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया ।
येन विज्ञातमात्रेण सर्वज्ञात्वं प्रपद्यते ॥

चाणक्य नीति - प्रथमोऽध्यायः श्लोक 02 का अर्थ

अधीत्येदं यथाशास्त्रं नरो जानाति सत्तमः ।
धर्मोपदेशविख्यातं कार्याकार्यं शुभाशुभम् ॥

चाणक्य नीति - प्रथमोऽध्यायः श्लोक 01 का अर्थ


प्रणम्य शिरसा विष्णुं त्रैलोक्याधिपतिं प्रभुम् ।
नानाशास्त्रोद्धृतं वक्ष्ये राजनीतिसमुच्चयम् ॥ 01 ॥