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चाणक्य नीति - प्रथमोऽध्यायः श्लोक 05 का अर्थ

दुष्टा भार्या शठं मित्रं भृत्यश्चोत्तरदायकः ।
ससर्पे च गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः ॥ 05 ॥


श्लोक का विवेचन:


दुष्टा भार्या शठं मित्रं भृत्यश्चोत्तरदायकः ।

इस श्लोक में कहा गया है कि दुष्ट स्त्री, शठ मित्र और उत्तराधिकारी भृत्य - ये तीनों ही व्यक्तियों के साथ संबंध बनाना अत्यंत अशुभ हैं।


ससर्पे च गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः ॥

और यहां यह बताया गया है कि एक सर्प के समान घर में रहना, मौत ही निश्चित है, इसमें कोई संदेह नहीं है।


इस श्लोक का सारांश:

यह श्लोक यह सिखाता है कि एक दुष्ट स्त्री, शठ मित्र और उत्तराधिकारी भृत्य - इन तीनों के साथ जुड़ना व्यक्ति को अत्यंत कष्टप्रद हो सकता है। उपमेय के रूप में सर्प का उल्लेख करके यह दिखाया गया है कि इन स्थितियों में रहकर व्यक्ति अपने जीवन को खतरे में डालता है, जिससे उसे संघर्ष और आत्महत्या की ओर बढ़ना पड़ सकता है।

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