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चाणक्य नीति - प्रथमोऽध्यायः श्लोक 13 का अर्थ

यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवं परिषेवते ।
ध्रुवाणि तस्य नश्यंति चाध्रुवं नष्टमेव हि ॥ 13 ॥

श्लोक का विवेचन:


यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवं परिषेवते ।

इस श्लोक में कहा गया है कि जो व्यक्ति दृढ़ स्थायिता और स्थिरता को छोड़कर अस्थायी और अस्थिर चीजों की प्राप्ति के लिए प्रयासरत होता है।


ध्रुवाणि तस्य नश्यंति चाध्रुवं नष्टमेव हि ॥ 13 ॥

और यहां यह बताया गया है कि उसका स्थायिता को छोड़ने से उसका स्थायिता ही नष्ट होता है।


इस श्लोक का सारांश:

यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि जो व्यक्ति अध्रुव और अस्थायी चीजों की मोहितता में पड़कर स्थिर और सत्य को छोड़ता है, वह अपने ध्रुव स्वरूप को खो देता है। ध्रुव स्वरूप की अपनी मूल स्थिति को छोड़कर अध्रुव और अस्थायी विषयों की प्राप्ति का पीछा करना व्यक्ति को नष्टता की दिशा में ले जाता है। इसलिए, हमें हमेशा अपने सत्य स्वरूप और ध्रुव स्थान को महत्वपूर्ण रूप से मान्यता देना चाहिए ताकि हम अध्रुव और अस्थायी चीजों की मोहितता से बच सकें।

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