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चाणक्य नीति - प्रथमोऽध्यायः श्लोक 06 का अर्थ

आपदर्थे धनं रक्षेच्छ्रीमतां कुत आपदः ।
कदाचिच्चलते लक्ष्मीः संचितोऽपि विनश्यति ॥


श्लोक का विवेचन:


आपदर्थे धनं रक्षेच्छ्रीमतां कुत आपदः ।

यह श्लोक धनी और श्रीमंत व्यक्तियों के लिए है और इसमें एक महत्वपूर्ण सिख दी गई है। श्लोक का अर्थ है - "ऐसे व्यक्ति, जिनके पास धन और श्री है, आपदा के समय में अपने धन की रक्षा कैसे करेंगे? कभी-कभी तो ऐसा होता है कि श्रीमंत व्यक्ति अपनी धन लक्ष्मी को चलते हुए देखता है, लेकिन यह बात सच नहीं है क्योंकि धन का अधिकारी भी आपदा के समय में पीड़ित हो सकता है।**


कदाचिच्चलते लक्ष्मीः संचितोऽपि विनश्यति ॥

यह भाग यह कहता है कि किसी भी समय लक्ष्मी (धन, समृद्धि) चल सकती है, और संचित धन भी विनाश हो सकता है। धन की रक्षा करना महत्वपूर्ण है, लेकिन आपदा के समय में व्यक्ति को सतर्क रहना भी आवश्यक है। ऐसे समय में धन का सही प्रबंधन करना और सबकुछ को सावधानीपूर्वक चलाना महत्वपूर्ण है, ताकि धन का नुकसान न हो।

इस श्लोक का सारांश:

इस श्लोक से हमें यह सिखने को मिलता है कि धन की प्राप्ति के बाद भी व्यक्ति को सतर्क रहना चाहिए। आपदा के समय में धन का सही रूप से प्रबंधन करना और अपने आप को सुरक्षित रखना आवश्यक है। यह शिक्षा हमें सिखाती है कि श्रीमंत व्यक्ति भी धन की नगरी में आपदा से प्रभावित हो सकता है, और उसे भी अपने धन की रक्षा के लिए सतर्क रहना चाहिए।

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